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शनिवार, 20 अगस्त 2011

कल रात बरबस आँसूं निकल गए

आँसूं निकल गए
शर्म में मन के
ख्याल बाहर आ गए
अविरल बहते रहे
ग्लानि में उन्हें बहने दिया
रोकने का प्रयास ना किया
जब एक
गांधीवादी बुजुर्ग के
जीवन संघर्ष के
कई पहलूओं का ज्ञान हुआ
जीवन दूसरों पर
न्योछावर किया
निस्वार्थ भाव से
हर कष्ट सहा
हिम्मत और साहस से
लड़ रहे
देश भक्त के प्रति श्रद्धा में
सर झुक गया
फिर पश्चाताप में
डूब गया
क्यों अब तक
कुछ ना कर सका
देश के लिए ?
खुद से पूछने लगा ?
उत्तर भी तुरंत मिल गया
देश से ज्यादा ध्यान
खुद का रहा
अब प्रण कर लिया
जो पहले नहीं कर सका
अब करना है
अन्ना हजारे
जैसे ही लड़ना है
निरंतर दूसरों के लिए
जीना है
20-08-2011
1385-107-08-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुदर , प्रेरणादायक . देश को ऐसे ही जूनून की जरूरत है .

    मेरे नाना जी और गाँधी जी ने साथ - साथ देश की सेवा की है. अपने देश को सदैव ऊपर ही देखना चाहते है. पर दुःख की बात है की आपने देश को अपनों ने ही लूटा है

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