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रविवार, 28 अगस्त 2011

क्या अजीब मुलाक़ात थी

क्या अजीब
मुलाक़ात थी
ना मिलने की
चाहत थी
ना इंतज़ार था
एक खूबसूरसत
इत्तफाक था
ना वो जानती थी
ना मैं जानता था
बहुत खूबसूरत थी
अकेली बैठी थी
बैंच सिर्फ एक थी
मैं भी बैठ गया
उनके हाथ से
हाथ छू गया
मुंह से
माफ़ कीजिएगा 
निकल गया
कोई बात नहीं
कह कर 
वो मुस्करा दिए
होंसला बढ़ गया
नाम पता पूछ
लिया
ज़िन्दगी में अकेली हैं
ये भी जान लिया
घर आने का
बुलावा मिला
वहां भी पहुँच गया
पड़ोसियों ने बताया
बरसों पहले रहती थी
ट्रेन हादसे में फौत
हो गयी
कई लोगों को
स्टेशन पर मिलती  हैं
घर बुलाती हैं 
खुद कहीं खो जाती हैं
चाहने वाले ढूंढते
रह जाते हैं
निरंतर मुलाक़ात को
याद करते रहते हैं
28-08-2011
11411-133-08-11

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