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सोमवार, 1 अगस्त 2011

मेरा दम घुटता



दम घुटता है
मन रोने का करता हैं
क्यों अपना
अब पराया लगता है ?
कल तक गले में
हाथ ड़ाल घूमता था
अब गला दबाने की
कोशिश करता है
दोस्त दुश्मन में
फर्क कम हो गया
स्वार्थ बढ़ गया
जीवन से ज्यादा
धन आवश्यक हो गया
निरंतर सोचता हूँ
कारण ढूंढता हूँ
निरुत्तर रहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-08-2011
1281-03-08-11

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