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बुधवार, 17 अगस्त 2011

क्या दिया ज़िन्दगी ने मुझको खुद से पूछता हूँ


क्या दिया
ज़िन्दगी ने
मुझको
खुद से पूछता हूँ
अतीत को
टटोलता हूँ
कभी हंसता हूँ
कभी रोता हूँ
निरंतर सोच में
पड़ता हूँ
जो करना नहीं
चाहिए था
उसका
सुधार करूँ  ?
भविष्य को
चैन से भर दूं
या बचा समय
ऐसे ही काट लूं ?
क्या खुद को
माफ़ कर पाऊंगा ?
क्या चैन से
मर पाऊंगा ?
उत्तर मिलता नहीं
क्या इसे कर्मों की
सज़ा समझूँ ?
आगे दिल
किसी का
ना दुखाऊँ
वो रास्ता
समझूँ ?
17-08-2011
1370-92-08-11
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर     

3 टिप्‍पणियां:

  1. jindagi jine ka naam hai ........ dhoop or chaya dono hi iske phaloo hai . sir kai baar hamen kuch sawalo ke sahi jabab hi nahi milte . to hamen waqt pat hi sab chod kar aage bad jana chahiye . kai baar aapki kavita paad kar aaisa lagta hai jaise hum kudh se hi sawal kar rahen hai .

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  2. बेहतरीन पोस्ट, अच्छी जानकारी देते हुए।
    जो दिया उसमें खुश रहो।

    उत्तर देंहटाएं