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शनिवार, 13 अगस्त 2011

नन्हे हाथ अब नर्म नहीं रहे



नन्हे हाथ अब
नर्म नहीं रहे
दो रोटी के लिए
मिट्टी से सन गए
जीने की मजबूरी में
खुरदरे हो गए
खुद के वज़न से
ज्यादा बोझ
उठाने लगे
खेलने की उम्र में
कर्म में जुट गए
सर्दी गर्मी बरसात के 
सारे मौसम भूल गए
समय से पहले ही
जीवन की
कडवी सच्चाई
जान गए
खिलने से पहले ही
फूल मुरझाने लगे
हम खड़े देखते रहे
सवालों में उलझे रहे
गरीब की
चिंता करते रहे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बाल श्रम,बचपन,गरीबी,जीवन,दुःख, 

13-08-2011
1352-74-08-11


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