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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

दो मुट्ठी मिट्टी मेरी कब्र पर डाल देना


ज़िन्दगी भर
इंतज़ार किया
रातों को जागता रहा
निरंतर
अश्क बहाता रहा 
हसरतों का खून हो गया
इज़हार-ऐ-मोहब्बत का
जवाब ना मिला
अब मेरी आखिरी
इल्तजा सुन लो 
रूह के सुकून के
खातिर ही सही
मरने के बाद
दो मुट्ठी मिट्टी मेरी
कब्र पर डाल देना
जो मुझे ना मिल सका
मेरी लाश को दे देना
अपनी बेरुखी पर
पर्दा डाल देना
डा,राजेंद्र तेला,निरंतर 
11-08-2011
अश्क, इंतज़ार, इल्तजा, इज़हार-ऐ-मोहब्बत, शायरी , बेरुखी, मोहब्बत, 

4 टिप्‍पणियां:

  1. dear sir
    very nice .........
    जो मुझे ना मिल सका

    मेरी लाश को दे देना

    अपनी बेरुखी पर पर्दा

    डाल देना
    isase jayada to jindagi se kuch nahi manga hamne ..
    jo ji kar na paa sake ......
    marne ke baad hi de dena ...
    bas ek shikayat hi rahi jindgi se
    tohfa mila to sahi par woh bhi berukhi ka .........
    to socha ki jo jeevan me na pa sake to
    marne par bhi kyaun chahat rakhen ........
    hamne to sirf pyar kiya hai
    uska mol nahi maanga .......
    jate -jate bhi hum sirf de kar hi jayenge .........!

    उत्तर देंहटाएं
  2. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)13 अगस्त 2011 को 9:45 am

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    बहुत अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुति है!
    रक्षाबन्धन के पुनीत पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. शालिनी कौशिक13 अगस्त 2011 को 9:45 am

    शालिनी कौशिक said...

    बहुत भावपूर्ण .सुन्दर प्रस्तुति. बधाई
    August 13, 2011 12:39 AM

    उत्तर देंहटाएं
  4. dr. shama khan said...

    very nice....berookhi per metti dal dena...very tuching...
    August 13, 2011 10:50 PM

    उत्तर देंहटाएं