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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

मन की पीड़ा मन में नहीं रहती

मन कितना भी

कठोर कर लो

चाहे जितना

खुद को समझा लो

मन की पीड़ा

निरंतर

मन में नहीं रहती

बाहर आ ही जाती

लाख छिपाओ

छुप नहीं पाती

कभी आँखों से अश्क

बन कर बहती

निरंतर

चेहरे पर झलकती

कभी जुबां से

निकलती

कभी कलम के ज़रिये

जग को पता

पड़ती

मन की पीड़ा मन में

नहीं रहती

09-08-2011

1322-44-08-11

7 टिप्‍पणियां:

  1. wonderful , man ki pida maan me nahi rahati wo to shabdo ka roop le leti hai ........... beautiful

    उत्तर देंहटाएं
  2. man ki peeda kahan chupti hai.samajhne vaale samajh hi jaate hain.bahut pyari rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुश्किल तो होता है छिपाना , किसी न किसी तरह अभिव्यक्त हो ही जाती है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

    कल 16/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन की पीड़ा मन में नहीं रहती,अदभुत रचना।

    उत्तर देंहटाएं