ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

अब इज़हार नहीं करता

ये ना समझना
तुम्हें याद नहीं करता
निरंतर तुम्हें चाहा
दिल तुमसे लगाया
खुद के लगाए
गुलशन को
उजाड़ नहीं सकता
गुल कहीं भी खिले
उसे मुरझाते 
देख नहीं सकता 
ये बात जुदा है
अब इज़हार नहीं
करता
19-07-2011
1206-86-07-11
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

5 टिप्‍पणियां:

  1. कुश्वंश said...

    उम्दा कविता वाह
    July 20, 2011 7:16 AM

    उत्तर देंहटाएं
  2. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)20 जुलाई 2011 को 12:07 pm

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    बहुत उम्दा!
    July 20, 2011 6:40 AM

    उत्तर देंहटाएं
  3. शालिनी कौशिक21 जुलाई 2011 को 5:46 pm

    शालिनी कौशिक said...

    बहुत भावपूर्ण .बधाई.
    July 20, 2011 5:34 PM

    उत्तर देंहटाएं
  4. sushma 'आहुति' said...

    ये रचना ही सब कुछ कह रही है...
    July 20, 2011 7:39 PM

    उत्तर देंहटाएं
  5. शिखा कौशिक21 जुलाई 2011 को 5:47 pm

    शिखा कौशिक said...

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति .आभार .
    July 20, 2011 9:50 PM

    उत्तर देंहटाएं