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रविवार, 24 जुलाई 2011

ज़िन्दगी फ़ुटबाल का खेल

ज़िन्दगी
फ़ुटबाल का खेल
गेंद कभी इधर
कभी उधर रहती
कभी चोट खाते
कभी
ज़मीन पर गिरते
कभी गेंद गोल में
कभी गोल के बाहर
रहती
कभी विपक्षी भारी
कभी हम भारी
निरंतर
गम और खुशी साथ
चलती रहती
ध्यान
जिसका गेंद पर
वह जीतता
ध्यान हटाने वाला
निरंतर हारता
जीत के लिए खेलना
ज़रूरी
हार जीत खेलने से
होती
बिना खेले ज़िन्दगी
अधूरी रहती
24-07-2011
1222-102-07-11

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-07-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर मंगलवारीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह! बहुत सुन्दर रचना...
    सादर....

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही कहा ......ख़ुशी और गम तो जिंदगी के ही दो पहलु हैं लेकिन किसी कार्य को करते समय एकाग्रता आवश्यक है

    उत्तर देंहटाएं