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बुधवार, 20 जुलाई 2011

रोकर जियो या हंस कर जियो

रात बीती
ख़्वाबों की लड़ी टूटी
ख्यालों की बातें
दफ़न हो गयी
दर्द सारे दब गए
क्या आज करना है ?
याद रहा
जीने के लिए
पेट की आग को
बुझाना है
रोकर जियो या
हंस कर जियो
जब तक जान हैं
मजबूरी  है
जीने के लिए
सब कुछ भूलना है
निरंतर काम तो
करना है
20-07-2011
1210-90-07-11

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