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शनिवार, 2 जुलाई 2011

अहसास ना था

आग बरसाते
सूरज की गर्मी में भी
कई आँखें उसका
इंतज़ार करती
वो बेखबर
तेज़ धूप में भी
ठंडक पहुंचाती
निरंतर इठलाती
बल खाती
चलती रहती
दुपट्टा जब
आँचल से सरक
गया
बहुतों के मुंह से
एक साथ निकली
आह को सुना
तब तक उसे
अपनी ख़ूबसूरती का
अहसास ना था
02-07-2011
1127-11-07-11

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