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बुधवार, 27 जुलाई 2011

हर मौसम खिजा का मौसम अब बहारें कहाँ देखूं ?

तुम्हारी जुदायी में

होश खो दिया

मोहब्बत का मतलब

भूल गया

शहर में तुमसा

कोई नहीं

अब दिल किससे लगाऊँ?

नज़रें कहीं और

टिकती नहीं

अब तमन्नाएँ क्या रखूँ ?

हर मौसम निरंतर खिजा का

मौसम

अब बहारें कहाँ देखूं ?

27-07-2011

1243-123 -07-11

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