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शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

मोहब्बत को बहता हुआ पानी समझ लिया

दर्द-ऐ-इश्क को

खुदा का फरमान

समझ

गले से लगा लिया

मोहब्बत को

बहता हुआ पानी

समझ लिया

जितना पी सका

पी लिया

जो बह गया उसे

उसे जाने दिया

अब निरंतर

रोना छोड़ दिया

गम में जीना

अब आदत बना लिया

काटी थी रातें जिसकी

याद में

उसे सपना समझ

भूल गया

22-07-2011

1214-94-07-11

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