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रविवार, 31 जुलाई 2011

दुविधा

दस साल पहले

आखिरी बार मिली थी

अब रास्ते अलग अलग

कह कर विदा हुयी

ना अब मिलती कभी

ना बात कभी होती

मेरी तस्वीर ज़रूर

उसके कमरे के कौने में

पडी मेज़ पर रखी थी

निरंतर धूल खाती थी

कई दिन उस पर नज़र

नहीं पड़ती

जिस दिन नज़र पड़ती ,

मिनिट दो मिनिट

टकटकी लगा कर देखती

चेहरे की रंगत बदलती

रहती

क्या सोच रही थी ?

किसी से ना कहती

कपडे की झाडन से

धूल हटाती

सलीके से फिर मेज़ पर

सजाती

दो चार दिन यही दोहराती

फिर भूल जाती

शायद अब भी तय नहीं

कर सकी थी

मुझ से दूरी रखे या फिर

लौट जाए

मिलने की चाहत रखे या

भूल जाए

ख्यालों के भंवर में फँसी थी

ना तस्वीर फैंकती

ना सीने से लगा कर रखती

ना खुल कर हँस पाती

ना खुल कर रो पाती

दुविधा में जीती जाती

31-07-2011

1273-157-07-11

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