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सोमवार, 18 जुलाई 2011

कब हकीकत को जानूंगा ?

कई रातें तेरी यादों में काटी
बार बार दिल को समझाया
कल सुबह नया सूरज उगेगा
मुखड़ा तेरा नज़र  आयेगा
हर सुबह पहले से बदतर
होती रही
तुमसे दूरी निरंतर बढ़ती रही
अब खुद से सवाल करता हूँ
कब हकीकत को जानूंगा ?
कब तक 
 बेबसी में ज़िन्दगी काटूंगा 
 दिल को भरमाऊंगा ?
खुद ही जवाब देता हूँ 
जब तक बहलेगा,बहलाऊंगा
नहीं बहलेगा तो जान दे दूंगा
18-07-2011
1200-80-07-11

5 टिप्‍पणियां:

  1. DR. ANWER JAMAL said...

    Nice way to die.
    July 18, 2011 1:04 PM

    उत्तर देंहटाएं
  2. डा. श्याम गुप्त19 जुलाई 2011 को 1:02 pm

    डा. श्याम गुप्त said...

    --- , आरज़ू अच्छी है...
    July 18, 2011 1:38 PM

    उत्तर देंहटाएं
  3. prerna argal said...

    bahut achchi aarjoo liye anoothi prastuti.badhaai aapko.

    उत्तर देंहटाएं
  4. sushma 'आहुति' said...

    very very nice...
    July 18, 2011 6:00 PM

    उत्तर देंहटाएं
  5. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)19 जुलाई 2011 को 1:03 pm

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    बहुत उम्दा प्रस्तुति!
    July 18, 2011 6:20 PM

    उत्तर देंहटाएं