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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

क्या खुद को प्यासा ,जीवन को अधूरा समझूँ ?


जीवन का
पानी भरपूर पीया
फिर भी प्यासा रहा
कुछ कमी निरंतर
महसूस करता रहा
भौतिक सुख को
सफलता का
पैमाना समझता रहा
खुशी का
पड़ाव मानता रहा
वो भ्रम निकला
सूर्य की तपन से
भाप बन उड़ जाने वाली
ओस का सा
जीवन जीता रहा
कुछ समय खुशी और
संतुष्टी का
अहसास मिलता तो रहा
पर अहसास
टिक नहीं पाया
उम्र के जिस मोड़ पर
खडा हूँ
सब बेमानी लगता है
अब पता चल रहा है
सत्य से कितना दूर था
मन शांती चाहता है
शान्ति बिना जीवन भी
बिना महक के फूल सा
हो जाता
जो खिलता तो है मगर
मन को लुभाता नहीं
ऐसा जीवन
ना मन को
संतुष्ट रख पाता
ना जीवन की
प्यास बुझा पाता
समझ नहीं पाता हूँ
क्या जीवन को अधूरा
खुद को प्यासा समझूँ ?
या जैसे जीता रहा
वैसे ही असंतुष्ट जीता रहूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-07-2011
1172-55-07-11

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति ||

    बंजर धरती से मैंने सोना उपजाया,
    कूप और नलकूपों का इक जाल बिछाया ||

    जीवन भर ढोया पानी, फिर भी प्यासा मै,
    जीवन - संध्या की हूँ , घनघोर निराशा मै ||

    देख - भालकर ही मैंने हर कदम उठाया
    भटक रहे हर राही को, सदमार्ग दिखाया ||

    कस्मे-वायदे-प्यार-वफ़ा की करी बंदगी
    पर-सेवा, पर-हितकारी यह रही जिंदगी ||

    फिर भी कोई कमी काल सी कसक रही है
    अंतस में अन्जानी चाहत सिसक रही है ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. योगाचार्य विजय13 जुलाई 2011 को 5:19 pm

    योगाचार्य विजय ने कहा…
    १२ जुलाई २०११ ८:४१ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  3. sushma 'आहुति' ने कहा…
    बेहतरीन प्रस्तुती....
    १३ जुलाई २०११ ९:०७ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  4. शालिनी कौशिक13 जुलाई 2011 को 5:20 pm

    शालिनी कौशिक ने कहा…
    bahut sundar likha hai rajendra ji,badhai.
    १३ जुलाई २०११ ४:४७ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं