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सोमवार, 20 जून 2011

अरमानों का घडा

मुझे देख रही थी
नज़रों से नज़रें मिली
तो मुस्कराने लगी
मैं भी मुस्कराया 
आहिस्ता आहिस्ता
मेरी तरफ बढ़ी
मैं भी उम्मीद में
उसकी तरफ बढ़ा
दोनों एक जगह
आमने सामने रुके
समय क्या हुआ ?,
उसने पूछा
पांच बजे हैं, मैंने कहा
धन्यवाद उसने कहा
हिम्मत कर मैंने पूछा,
अकेली हो  
हाँ ,उसने जवाब दिया
खुश होता उससे पहले ही
मातमी सन्देश साथ में दिया
वो आने वाले हैं
तब तक  मित्र का
इंतज़ार कर रही हूँ
अभी इतना इंतज़ार कराते हैं
शादी के बाद क्या करेंगे ?
कह कर मेरे अरमानों का
घडा फोड़ दिया
20-06-2011
1079-106-06-11

1 टिप्पणी:

  1. अरमानों का
    घडा फोड़ दिया ||

    मिटटी के घड़े
    होते ही फूटने के लिए |
    अरमानों का हो या पाप का --
    घड़ा है
    फूटेगा ही ||
    भगवान का बनाया यह घड़ा भी--
    जाने कब तक??

    उत्तर देंहटाएं