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सोमवार, 6 जून 2011

अपने पराये सब इकसार हो गए

लगता है  
दिन सुनहरे ख़त्म 
हो गए
खुशी के लम्हे सिर्फ
यादों में बचे
गम-ऐ-हयात याद
रह गए
कब हंसना ये भी
भूल गए
रोने की बात नहीं
 फिर भी निरंतर आंसू
निकल रहे
गम अब आदत 
हो गए
चुप रहना सिखा 
गए
अपने पराये सब
इकसार हो गए
06-06-2011
      1010-37-06-11    
(गम-ऐ-हयात= जीवन का दुख)

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