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मंगलवार, 14 जून 2011

जो इंसान बन के ना जी सके,उसे जीने का क्या हक है

बिना खुशी
हंसी का क्या अर्थ है
दिन रात दौड़ना
रो रो कर जीना
बिना हंसी के व्यर्थ है
बिना अपनों के जीना
दंड है
रिश्तों में शक करना
कलंक है
नफ़ा नुकसान ढूंढना
स्वार्थ है
माँ बाप को जो सम्मान
ना दे वो निकृष्ट है
निरंतर नफरत से
जीने वाला शैतान है
जो किसी पर 
विश्वाश ना करे
उस से रिश्ता व्यर्थ है
जो किसी की मदद 

ना करे
उसका जीना व्यर्थ है
जो इंसान बन के 
ना जी सके
उसे जीने का क्या 
हक है
14-06-2011
        1045-72-06-11   

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