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गुरुवार, 16 जून 2011

तृष्णा

किसी को पता नहीं
उसे क्या चाहिए
बहुत ग्रन्थ पढ़े
बहुत ज्ञानी मिले
बहुत बातें हुयी
बहुत कुछ नया जाना
कई बार आभास होता
मंजिल का पता
चल गया
हर बार भ्रम टूटा
जो जहां था वहीँ रहा
पता नहीं चला क्या
चाहिए?
निरंतर नए सपने
बुने जाते
पाने की आशा में
तल्लीन होते
कुछ दिनों में
थक जाते
कुछ और ढूँढने
लगते
तृष्णा में जीवन
जीते जाते
जैसे आये थे
वैसे ही चले जाते
16-06-2011
1054-81-06-11

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना दार्शनिक चिंतन ...सास्वत सत्य की अंतहीन खोज ....कोटि कोटि शुभ कामनाएं....

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