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शुक्रवार, 17 जून 2011

रोज़ कुछ नया लिखता हूँ , दर्द-ऐ-दिल मिटाता हूँ

  मुझे पुरस्कार नहीं
चाहिए
ना ही  कोई तमगा
चाहिए
जो लिखता हूँ पढ़ लो
जो सोचता हूँ , 
समझ लो
मंथन विचारों का 
कर लो
पसंद आये तो
लिख कर बता दो
ना पसंद आये तो
साफ़ साफ़ कह दो
जो चलता जहन में
निरंतर लिख कर 
बताता हूँ
हर बात साफ़ साफ़ 
कहता हूँ
किसी को नाराज़ करने की
मंशा नहीं
किसी को खुश करने की
चाहत नहीं
मुझे निरंतर लिखना है
रोज़ कुछ नया लिखता हूँ
दर्द-ऐ-दिल मिटाता हूँ
17-06-2011
1063-90-06-11

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