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शुक्रवार, 17 जून 2011

जब कूद ही गया जंग-ऐ-मोहब्बत में तो, सोचता क्यूं है ?

जब कूद ही गया
जंग-ऐ-मोहब्बत में
तो सोचता क्यूं है ?
जब दिल ही  दे दिया
तो रोता क्यूं है ?
वादा किया ज़िन्दगी
साथ बिताने का
तो परेशान क्यूं है ?
करना पड़ता
है इंतज़ार मोहब्बत में
तड़पता क्यूं है ?
बहुत सहना पड़ता है
मोहब्बत में
कहता क्यूं है ?
जान से हाथ भी
धोना पड़ता है मोहब्बत में
डरता क्यूं है ?
घुट घुट के रहना पड़ता है
मोहब्बत में
दुनिया को बताता 
क्यूं है ?
जुदाई भी होती 
मोहब्बत में
घबराता क्यूं है ?
ख्वाईशें पूरी होती नहीं
हर बार मोहब्बत में
उम्मीद करता क्यूं है ?
होता रहता मोहब्बत में
लिखता क्यूं है ?
1060-87-06-11

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