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गुरुवार, 23 जून 2011

देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है

वर्षा का मौसम
दहलीज पर था
खेतों में बीज बोये गए
अच्छी वर्षा के लिए
गाँव वाले
परमात्मा से प्रार्थना
करने लगे
कई दिन बीत गए
वर्षा का 
नामों निशान ना था
चेहरे
मायूस होने लगे
गाँव में हवन व यज्ञ 
होने लगे

बादल आते चेहरे पर
संतोष लाते
निरंतर बिना बरसे
चले जाते
गाँव वाले अकाल  की
आशंकाओं से घबराने लगे
फिर एक दिन काले
घनघोर बादल आये
जम कर बरसने लगे
रुकने का 
नाम नहीं ले रहे थे
अब गाँव वाले
वर्षा रुकने के लिए
प्रार्थना करने लगे
बाढ़ के डर से सहमने लगे 
फिर से 
हवन यज्ञ होने लगे
लोग समझ नहीं पा रहे थे
उनकी अगाध श्रद्धा
और प्रार्थना से वर्षा हुयी
तो फिर प्रार्थना से
रुकती क्यों नहीं है
सब मिल कर
परमात्मा के न्याय पर
प्रश्न उठाने लगे
या तो देता ही नहीं है
देता है तो छप्पर फाड़
कर देता है
कहावत का
अर्थ समझने लगे
23-06-2011
1090-117-06-11

1 टिप्पणी:

  1. सब मिल कर
    परमात्मा के न्याय पर
    प्रश्न उठाने लगे
    या तो देता ही नहीं है
    देता है तो छप्पर फाड़
    कर देता है
    .
    बहुत खूब

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