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शनिवार, 11 जून 2011

रो रो कर खुद से कहता हूँ,उसके बिना मैं तनहा हूँ

निरंतर
खुद से कहता हूँ
उसके बिना मैं तनहा हूँ ,
हर लम्हा बेचैन रहता हूँ
यादों का समंदर उफनता
उसके पास ले जाता
तन्हायी को मिटाता
कभी उसकी आवाज़ में
ग़ज़ल सुनायी देती
चुलबुली हंसी खनकती
बदन में गुदगुदी करती
कभी बालों में हाथ फिराती
एक पल भी चैन नहीं लेने देती
निरंतर इठलाती,इतराती
रोमांचित करती
ज़न्नत का अहसास कराती
कौन कहता है ?
मैं तनहा हूँ
जोर से चिल्लाता हूँ
यादों का तूफ़ान थमता है
होश में आता हूँ
मायूसी से घिरता हूँ
रो रो कर फिर से कहता हूँ
उसके बिना मैं तनहा हूँ
11-06-2011
1034-61-06-11

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