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बुधवार, 1 जून 2011

गुलशन को फिर गुलों से महका दे

दिल मेरा 
उजड़ा हुआ गुलशन
बहारों का मुंतज़िर 
दुआ खुदा से करता 
गुलशन को
फिर गुलों से महका दे
मोहब्बत के पानी से
सींच दे
मरने से पहले फिर
 किसी को
अपना कह सकूं
फिर से हंस सकूं
हसरत
मेरी पूरी कर दे
01-06-2011
976-03-05-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी की शायरी प्रसंशनीय है। बधाई।
    ============================
    मखमली डिबिया में टुकड़ा कांच का बिक जाएगा
    चीथड़ों में एक हीरा है मगर देखेगा कौन -मरयम आपा
    ---------------------------------------------------
    आओ मछली कि तरह मुझको तडपता देख लो
    तीर तुमने ही चलाया है असर देखेगा कौन -मरयम आपा
    ==============================
    ’व्यंग्य’ उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
    =====================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी की शायरी प्रसंशनीय है। बधाई।
    ============================
    मखमली डिबिया में टुकड़ा कांच का बिक जाएगा
    चीथड़ों में एक हीरा है मगर देखेगा कौन -मरयम आपा
    -------------------------------
    आओ मछली कि तरह मुझको तडपता देख लो
    तीर तुमने ही चलाया है असर देखेगा कौन -मरयम आपा
    ==============================
    ’व्यंग्य’ उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
    =====================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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