ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

बुधवार, 11 मई 2011

मुरझाये फूल को कौन देखता?

मुरझाये फूल को
कौन देखता है ?
 उसकी सुगंध
कौन सूंघता है ?
कभी आँखों का
तारा होता था
बगिया का चेहरा था
अब मुरझा गया
झुर्रियों से भर गया
अब उसे
कौन देखता है ?
जीवन का
यही चलन है
संसार का
यही नियम है
उगते सूरज को
नमन
कौन नहीं करता
अस्त को
कौन पूजता है ?
नयी कलियाँ
सब को मोहती हैं
खिले फूल की
छवि भी लुभाती है
खुशबू निरंतर भाती है
आने वाले की प्रतीक्षा
सब को रहती है
जाने वाले को
कौन पूंछता है ?
मुरझाये फूल को
कौन देखता है ?

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-05-2011
838-45-05-11
जीवन,मृत्यु,बुढापा,फूल

4 टिप्‍पणियां:

  1. sushma 'आहुति'12 मई 2011 को 5:49 pm

    sushma 'आहुति' ने कहा…

    bhut hi khubsurat...
    १२ मई २०११ ८:२४ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  2. तीसरी आंख12 मई 2011 को 5:49 pm

    तीसरी आंख ने कहा…

    जीवन दर्शन को अभिव्यक्त करती एक अच्छी रचना है
    १२ मई २०११ ९:३२ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  3. Vaanbhatt ने कहा…

    नहीं तेला जी, ऐसा नहीं है...कुछ लोग इतनी विरासत छोड़ जाते हैं कि लोग भूलना चाहें तो भी नहीं भूल पाते...हम जाते-जाते इतना कर जाएँ कि सबके दिलों में बस जाएँ...रहे ना रहे हम महका करेंगे...उगता और डूबता सूरज एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं...फूल को भी खुश रहना चहिये कि कभी उसकी वजह से कितने लोगों ने उपेक्छा झेली...
    ११ मई २०११ ९:०१ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  4. mahendra srivastava ने कहा…

    मुरझाये
    फूल को कौन देखता ?
    नयी कलियाँ सब को
    मोहती
    खिले फूल की छवि
    लुभाती

    बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति
    १२ मई २०११ ६:०५ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं