ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

बुधवार, 18 मई 2011

हर रात उसे भी ऐसे ही जलाया जाता

सुबह का
सूरज निकला
किरणों ने
धरती को चूमा
उसका भी दिन
प्रारम्भ हुआ
नींद खुली
बदन दुःख रहा था
अस्तव्यस्त
कपड़ों को ठीक किया
बिखरे बालों को
कंघी से संवारा
लम्बी जम्हायी ली,
कुल्ला किया
रसोई के चूल्हे में
लकडियाँ डाली,
तीली लगायी
चाय बनाने के लिए
पतीली चढ़ायी
पानी गर्म होने का
इंतज़ार करते करते
रात का
ध्यान आने लगा
मन घबराहट से
भर गया
उसका दिन
ऐसे ही शुरू होता था
हर दिन गरीबी का
मूल्य चुकाना पड़ता
नए दिन की सुबह भी
रात की यादें
पीछा नहीं छोडती
हर रात उसे भी
चूल्हे की लकड़ी सा
जलना पड़ता था
राख जैसी निस्तेज
ना हो जाती
तब तक शरीर से
खेला जाता
कोई ना कोई ग्राहक
देर रात तक शराब के
नशे में चूर हो कर आता
शरीर की भूख मिटाता
थकता नहीं ,
तब तक शरीर को
झंझोड़त़ा रहता
हवस की
तीली लगाता रहता
हर रात उसे भी
ऐसे ही जलाया जाता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
18-05-2011
883-90-05-11
हवस,नारी,दर्द,स्त्री गरीबी,

1 टिप्पणी:

  1. sach hai........
    din bhar vah zindgi ki aag me jalti hai
    aur raat bhar

    anchaahi mout marti hai

    kai kai bar
    lagaatar ...................

    उत्तर देंहटाएं