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सोमवार, 16 मई 2011

कब्र में लेटे हुए सिसक रहे

बच्चे ,बूढ़े,जवान
कब्र में
लेटे हुए सिसक रहे
रह रह कर आवाज़
लगा रहे
हमें बाहर निकालो
अन्दर दम घुट रहा
खुली हवा में आना
चाहते
बाहर नदी किनारे बैठे
जीवन से दुखी
मोहब्बत में नाकाम
इम्तहान में फेल
होने वाले
जान देने की तैय्यारी
कर रहे
खुली हवा में भी परेशान
निरंतर
खुदा की नियामत को
ठुकरा रहे
16-05-2011
868-75-05-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चाई को व्यक्त करती कविता के लिए बधाई !!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच कहा आपने ....खुदा की नियामत को
    ठुकरा रहे
    अति सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं