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रविवार, 8 मई 2011

जीने का मतलब कैसे जानूं ?

ग़मों से
राहत मिले तो
ख्याल खुद का करूँ
रोने से
निजात मिले तो
कभी मैं भी हँसू
अपने
दुश्मन ना समझे तो
उन्हें गले से लगाऊँ 
निरंतर
बेवफाई ना हो तो
उन्हें वफ़ा दिखाऊँ
ज़हन्नुम से निकलूँ तो
ज़न्नत की सोचूँ
हर लम्हा मरता हूँ
जीने का मतलब
  कैसे जानूं ?
08-05-2011
823-30-05-11

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह निरंतर जी. बहुत खूब लिखते हैं आप.

    मेरे ब्लॉग दुनाली पर देखें-
    मैं तुझसे हूँ, माँ

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (9-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. फिर भी जीने तो ज़रूरी है .. चाहे मतलब समझ आए या नही ...

    उत्तर देंहटाएं