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मंगलवार, 17 मई 2011

किसी अपने को ढूंढता रहूँ ?

रात की तन्हाईयों
में चाँद रोज़
खिड़की से झांकता
किरणों को थाम
साथ आने का इशारा
करता
निरंतर जहन में
ख्याल आता
साथ चले जाऊं ?
ज़िन्दगी के अंधेरों से
दूर हो जाऊं?
या यहीं ,ज़मीं पर
लड़ता रहूँ ?
किसी अपने को
ढूंढता रहूँ ?
17-05-2011
874-81-05-11

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