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शुक्रवार, 13 मई 2011

घरवालों ने ही घर को लूट लिया

इमारत कभी बुलंद थी
खूबसूरत रंगों से भरी  थी
हर दीवार बहुत मज़बूत थी  
रंगीन तस्वीरों से सजी थी
चारों तरफ हरे भरे पेड़ थे
फल,फूलों से लदे थे
पक्षी निरंतर नीड़ बनाते
दिन रात चहचहाते
आवाज़ से
जीवन का अहसास कराते
लोग दूर से इमारत को
देखने आते 
वक़्त ने पलटा खाया
घर के बाशिंदों ने दीवारें
खोद दी
दीवारों से तसवीरें उखाड़ दी
पेड़ों की डालियाँ काट कर
जला दी
पक्षी उड़ गए,
नीड़ रीते हो गए
धीरे धीरे इमारत वीरान
हो गयी
खंडहर में तब्दील हो गयी
ना कोई रहता उसमें
ना देखता उसको
चमन,खिजा में बदल गया
लूट लिया
847-54-05-11

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