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मंगलवार, 24 मई 2011

गोरी कर रही श्रृंगार

गोरी कर रही श्रृंगार
पीया मिलन को
बेकरार
आँखों में काजल
मांग में सिन्दूर ,
बालों में गजरा पहन
शीशे में खुद को
निहार रही
दिमाग में पीया की
मूरत घूम रही
कभी खिड़की से झांके
कभी दरवाज़े को  देखे
बेसब्री कम होने का
नाम ना ले रही 
निरंतर इंतज़ार की
घड़ियाँ लम्बी हो रही
पीया कहाँ खो गए  ?
क्या तारीख भूल गए ?
सवाल मन  में उठने लगे
खैरियत से तो हैं ?
बुरे ख्याल आने लगे
घड़ी देखी ,
समय निकल चुका था
कैलेण्डर देखा
तारीख भी वही थी
ख़त निकाला ध्यान से पढ़ा
माथा पकड़ लिया
आँखों से आंसूं बहने लगे
ख़त में लिखा था 
पीया को आज नहीं
कल आना है
चेहरे पर खीज के साथ
संतोष के भाव आने लगे
उसे कल फिर श्रृंगार
करना होगा
तब तक इंतज़ार
करना पडेगा 
 24-05-2011
919-226-05-11

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