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सोमवार, 23 मई 2011

बहम


घर शहर से 
बाहर था
मैं घर में बिलकुल 
अकेला था
घुप्प अंधेरी  रात में
 दरवाज़े पर
खट खट हुयी
अन्दर आने दो की
आवाज़ आयी
खिड़की से 
एक शख्श खडा दिखा
दिल ने कहा
कोई गुंडा लूटने की
नियत से आया होगा
सोच कर दरवाज़ा
नहीं खोला
सुबह  नींद से जागा
खिड़की से देखा
घर से थोड़ी दूर
लोगों की भीड़ थी
चौकन्ना घर से निकला 
नज़दीक जाकर देखा
वो  शख्श 
ज़ख्मों से भरा
मरा पडा था
पता चला  पिछली शाम
एक अबला  की
इज्ज़त बचाने के लिए
गुंडों से लड़ा था 
मन ग्लानि से भर गया 
मेरे बहम ने 
एक बहादुर को
मार दिया
23-05-2011
909-116-05-11

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