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मंगलवार, 31 मई 2011

मेरा छोटा सा कमरा

मेरा 
छोटा सा कमरा 
किसी महल से भी
प्यारा लगता
हर दीवार खिड़की
घड़ी कैलंडर 
कौने में मेज 
जिस पर लिखता पढता
खिड़की के बाहर
लहलहाता गुलमोहर
उस पर बैठा
फाख्ता का जोड़ा भी
मुझे अपना लगता 
बरसों पुराना पलंग 
गहरी नींद में सुलाता
सब मेरे 
जीवन का हिस्सा
अँधेरे में भी 
क्या कहाँ पडा
सब दिखता 
एक अजीब सा 
सुकून मिलता उसमें
मेरा कमरा
रहने की जगह नहीं 
जीने का 
साधन हो गया 
मेरा मन
उसमें बस गया 
मोह 
सिर्फ जीवों से होता 
भ्रम टूट गया 
वर्षों से रहते रहते
मेरा 
कमरा मेरा सबसे
करीबी
रिश्तेदार हो गया 
हृदय कहता 
जो आनंद मुझे
मेरे कमरे में आता
वो कहीं और नसीब
नहीं होगा
उसके बिना जीवन
अधूरा लगेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन 
31-05-2011
968-175-05-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| अपने कमरे से लगाव हो जाना लाज़मी है|

    उत्तर देंहटाएं
  2. Anita ने कहा…2 जून 2011 को 7:59 pm

    Anita ने कहा…

    एक न एक दिन तो छूटेगा ही यह कमरा चाहे कितना ही हो अपना ...सुंदर रचना !
    २ जून २०११ ३:०४ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं