ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

गुरुवार, 19 मई 2011

बस इतना सा याद है

बस इतना सा 
याद है
जेठ की दोपहर में
बस के इंतज़ार में
पेड़ के 
नीचे खडी थी
माथे पर 
पसीने की बूँदें
मोती सी 
चमक रही थी
तपती दोपहरी में
उसकी ख़ूबसूरती 
आँखों को ठंडक दे
रही थी
निरंतर बरस रही
आग पर
पानी छिड़क
रही थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-05-2011
890-97-05-11

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें