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रविवार, 8 मई 2011

कोई बावफा मिल जाए


कोई बावफा मिल जाए
अब यही तमन्ना बाकी है
ज़ख्मों पर 
कोई मलहम लगाए
यादों पर
नया मुलम्मा चढ़ाए
सिर्फ यही आरज़ू बाकी है
निरंतर ज़द्दोज़हद 
अपनों से होती रही
कोई पराया 
अपना बन जाए
हसरत यही बाकी है
चेहरे पर चेहरा ना चढ़ा हो
ऐसा कोई मिल जाए
उम्मीद अब भी बाकी है  
08-05-2011
820-27-05-11
E

1 टिप्पणी:

  1. from shama khan drshamakhan39@gmail.com
    to "निरंतर की कलम से....."
    date Sun, May 8, 2011 at 12:54 PM
    subject Re: "निरंतर" की कलम से.....
    mailed-by gmail.com
    signed-by gmail.com

    hide details 12:54 PM (24 minutes ago)

    vefa ke telasha meatoe men bhetekta rehaga .......aab to ea dil bewafa ko hi dhonde lea......
    andaj a beya khbsoret hea...

    उत्तर देंहटाएं