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रविवार, 17 अप्रैल 2011

कभी हंसना कभी रोना ,शायद तरीका ज़िन्दगी का

मन मेरा
निरंतर भटकता
यादों में खोता रहता
जो रहे नहीं ,उन्हें ढूंढता
उनके साथ
 बिताए पलों में खोता
सपने में भी धोखा मुझे देते
एक बार भी नहीं दिखते
कभी ख्यालों में खोता
इक दिन
मुझे भी दुनिया से जाना होगा
क्या तब उनसे मिलना होगा?
या वहाँ भी ढूंढना होगा ?
ये कैसा विधान परमात्मा का ?
पहले देता,फिर लेता
क्यों निरंतर इम्तहान लेता
जब बिछड़ना ही होता
क्यों फिर अपनों से मिलाता
समझ नहीं पाया
फलसफा ज़िन्दगी का
कभी हंसना कभी रोना
शायद
तरीका ज़िन्दगी का
17-04-2011
692-116-04-11
    

2 टिप्‍पणियां:

  1. अपना ब्लॉग अब आपकी पोस्टों को नये अंदाज में प्रस्तुत कर रहा है, एक बार देखिये और अपनी राय दीजिए, नये अंदाज के बारे में कमेन्ट जरूर कीजिये जिससे कुछ सुधार किये जा सकें|

    देखिये अपना ब्लॉग का नया अंदाज "मनोरंजन" पृष्ठ पर

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना, मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
    यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके.,
    मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

    उत्तर देंहटाएं