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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

सिर्फ ऊंगली छुई थी


निरंतर लाइब्रेरी में 
मिलती थी
अलमारी से
एक ही किताब
दोनों को चाहिए थी 
कोशिश में
सिर्फ ऊंगली छुई थी
कनखियों से
देखा उसने
मंद मुस्कान से 
निमंत्रण दिया
खुद को 
रोक ना सका
सहर्ष स्वीकार किया 
कुछ तो 
ऐसा था उसमें
खुद को लाचार पाया
सिवाय हाँ कहने के
कुछ और ना
कह पाया
दिल अब पराया
हो गया
25-04-2011
759-179-04-11
E

4 टिप्‍पणियां:

  1. एम सिंह has left a new comment on your post "सिर्फ ऊंगली छुई थी":

    बहुत शानदार लिखते हैं आप. आपकी लेखनी के प्रभाव से आपका फोलोवर बनने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं दिखता.

    उत्तर देंहटाएं
  2. एम सिंह has left a new comment on your post "सिर्फ ऊंगली छुई थी":

    बहुत शानदार लिखते हैं आप. आपकी लेखनी के प्रभाव से आपका फोलोवर बनने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं दिखता.
    २६ अप्रैल २०११ ५:१९ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं