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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

बाकी सब चले गए

मौत के
दरवाज़े पर खडा था 
फिर भी निगाहें घर के
दरवाज़े पर थीं
सब परेशाँ मेरे लिए
मैं परेशाँ उनके लिए
सब इंतज़ार कर रहे थे
कब जाऊंगा
मैं इंतज़ार कर रहा था
कब आयेंगे
सब खामोशी से
दुआ कर रहे थे
ऊपर मुझे सुकून मिले
मैं खुदा से दुआ कर रहा 
ज़मीं पर उन्हें देख लूं
तो सुकून से ऊपर चलूँ
निरंतर इसी जद्दोजहद में
वक़्त गुजरता गया
ना वो आये,
ना मैं ऊपर गया
बाकी सब चले गए
मैं आज भी
इंतज़ार कर रहा 
25-04-2011
753-173-04-11

1 टिप्पणी:

  1. Pranaam Bhaisaahab.

    I read ur mails tday after a long gap.
    This poem is very simple and practical.I personally feel simple poems are very difficult to write.
    Anyways,life just goes on,day after day...

    Regards,
    Anu

    उत्तर देंहटाएं