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रविवार, 17 अप्रैल 2011

खुदा

लोग मंदिर,
मस्जिद में मुझे ढूंढते
धर्म के ठेकेदारों से
पता मेरा पूंछते
निरंतर नए तरीकों से
मुझे खोजते
फिर भी मुझे पाते नहीं
मैं इंसान के दिल में रहता
ईमान और इंसानियत में
बसता
लालच से नफरत मुझे
सूरज बन
उजाला दिन में करता
रात को
चाँद बन कर निकलता
जो दिल से ढूंढता,
सिर्फ उसे मिलता
17-04-2011
696-120-04-11

8 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी ana ने कहा…

    sashakta vichar......uttam abhivyakti

    १७ अप्रैल २०११ १०:१३ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  2. हरीश सिंह ने कहा…

    bahut sahi vichar. swagat.

    १७ अप्रैल २०११ १०:२४ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  3. आशुतोष ने कहा…

    सभी धर्मों से ऊपर मानव धर्म को दर्शाती सुन्दर कविता

    १७ अप्रैल २०११ १०:३० अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  4. Vaanbhatt ने कहा…

    yahan bhi khuda milega, vahan bhi khuda milega...jahan nahin khuda hai, vahan kal khuda milega...courtesy municipal corporation... andar bhi khuda pada hai maloom hua...

    १७ अप्रैल २०११ १०:५६ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  5. poonam singh ने कहा…

    सभी धर्मों से ऊपर मानव धर्म को दर्शाती सुन्दर कविता

    १८ अप्रैल २०११ ३:२० अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  6. kase kahun?by kavita. ने कहा…

    khuda ka sunishchit sathan hryday me hai...

    १८ अप्रैल २०११ ७:१६ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  7. मदन शर्मा ने कहा…

    खुबसूरत रचना! दिल से आभार आपका....

    १९ अप्रैल २०११ ७:०७ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं