ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

रविवार, 10 अप्रैल 2011

उलझन

उलझन 
में उलझा था
उलझन पर कुछ लिखूं
इसी उलझन में
उलझता  गया
समय बीतता गया
दिमाग और उलझता गया
कैसे इस 
उलझन को सुलझाऊं ?
सोचने लगा
जितना  सोचता 
उतना और  उलझता
तभी ख्याल आया
पढने वाले भी पढ़ते ,पढ़ते
उलझ गए होंगे
उनको उलझन से
मुक्त करने के लिए
उलझन पर उलझना
बंद किया
उलझन पर लिखना
निरंतर 
उलझन बन गया
जब भी उलझन 
शब्द आता
मैं फिर उलझता
10-04-2011
638-71-04-11

1 टिप्पणी: