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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

छुट्टे नहीं हैं (लघु हास्य कथा )

छुट्टे नहीं हैं (लघु हास्य कथा )
चौक से स्टेशन का ऑटो पकड़ा
सामान बहुत
था,किसी तरह बैठ गया
स्टेशन पहुंचा
,
ऑटो का किराया तेरह रूपये हुआ
मैंने पंद्रह रूपये दिए
ऑटो वाला बोला छुट्टे नहीं हैं
दो रूपये का नुक्सान बर्दाश्त नहीं था
सो कहा आगे लेलो छुट्टे करवा लो
दो सौ
कदम आगे बढे
किराया चौदह रूपये हो गया 
पर छुट्टा नहीं मिला
फिर वही समस्या

अब एक रुपया भी
पास खुल्ला नहीं था
क्या करता
,थोड़ा और आगे चलने को कहा
किराया सोलह
रूपये हो गया,
दिमाग परेशान हो गया
जो नुकसान
होना था हो गया
स्टेशन तक सामान के साथ

 जाना संभव नहीं था
सो उसे लौटने को कहा
वो बोला बाबूजी सर्कल से मोड़ना पडेगा

मरता क्या ना करता
,हाँ में सर हिलाया
घूम कर स्टेशन पहुंचा

किराया बढ़ कर इक्कीस रूपये हो गया
सर भन्ना गया
निरंतर होशयारी में दस का पत्ता साफ़ हो गया

समस्या फिर वही छुट्टा
नहीं है,
कह कर ऑटो वाला मुस्कराया
कहने लगा बाबूजी इसी को कहते हैं
चौबेजी छब्बे जी बन ने गए दूबेजी रह गए
मैं
खीसें निपोरने लगा
मन मसोस कर पच्चीस रूपये दे कर
,पीछा छुडाया
अब कसम खाली

बिना छुट्टे पैसों के घर से नहीं निकलूंगा

छुट्टे नहीं होंगे
,तो दिमाग नहीं लगाऊंगा
दो चार रूपये
,दान धर्म समझ कर दे दूंगा 
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-04-2011
605-38 -04-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. आस पास कोई भिखारी दिखे तो उससे छुट्टे करवा लीजिए- और दान देने का मन हो तो उसे दीजिए :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. 14 comments:

    Rajesh Kumari said...

    majedaar post.
    September 18, 2011 11:13 AM
    Maheshwari kaneri said...

    मजे़दार पोस्ट...
    September 18, 2011 11:25 AM
    Kailash C Sharma said...

    बहुत मज़ेदार..
    September 18, 2011 12:44 PM
    Anil Avtaar said...

    Bahoot khoob....
    September 18, 2011 12:55 PM
    वन्दना said...

    हा हा हा ऐसा ही होता है।
    September 18, 2011 1:04 PM
    रचना दीक्षित said...

    वाह आज कुछ माहौल हल्का कर दिया. हास्य व्यंग भी बहुत जरूरी हिस्सा है जिंदगी का. बधाई निरंतर जी.
    September 18, 2011 10:23 PM
    शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

    समझदारी
    :) :) :)
    September 19, 2011 5:45 AM
    वाणी गीत said...

    होशियारी महँगी पड़ जाती है!
    रोचक!
    September 19, 2011 7:37 AM
    कुश्वंश said...

    बहुत मज़ेदार.
    September 19, 2011 8:52 AM
    Geeta said...

    bohot khub
    September 19, 2011 10:32 AM
    Poorviya said...

    बिना छुट्टे पैसों के घर से नहीं निकलूंगा
    छुट्टे नहीं होंगे ,तो दिमाग नहीं लगाऊंगा
    दो चार रूपये ,दान धर्म समझ कर दे दूंगा

    jai baba banaras.........
    September 19, 2011 11:00 AM
    Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

    चौबेजी छब्बे जी बन ने गए दूबेजी रह गए

    सही बात है !
    September 19, 2011 1:28 PM
    Anita said...

    वाह ! बहुत रोचक कहानी.. जिंदगी भी तो कुछ ऐसे ही भरमाती है...
    September 19, 2011 2:15 PM
    Akhil said...

    bahut sundar...hot hai kabhi kabhi aisa bhi..
    September 19, 2011 6:39 PM

    उत्तर देंहटाएं