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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

कैसे सीमाओं में बंध जाऊं ?

लोग चाहते 
मैं रुक जाऊं
निरंतर 
चलना बंद कर दूं
नया सोचना 
नया करना छोड़ दूं
अपने में
सिमट कर रह जाऊं
सीमाओं में बंध जाऊं
दुनिया के 
रेले में मिल जाऊं
मैं ठहरा बहता पानी
कैसे उनके जाल में
फँस जाऊं ?
मुझे बहना है
समुद्र में मिलना है
बादल बन
आकाश को छूना है
निरंतर नया करना है
कैसे सीमाओं में
बंध जाऊं ?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-04-2011
746-166-04-11
E

7 टिप्‍पणियां:

  1. Vaanbhatt ने कहा…

    samundar tak ki yatra karani zaruri hai...bandh kar rahna nahin hai chahe koi kitani bhi koshishein kare...na chalna chhodiye, na sochna aur na bahana...utaam rachna...

    २४ अप्रैल २०११ ८:०१ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  2. Dr. shyam gupta ने कहा…

    सुन्दर भाव...

    विश्व में वह कौन सीमाहीन है
    हो न जिसका खोज सीमा में मिला

    २४ अप्रैल २०११ ९:३१ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  3. आशुतोष ने कहा…

    निरंतर को कौन बांध सकता है सीमाओं में..
    सुन्दर रचना..आप मुक्त व्योम में ऐसे ही विचरण करें ..
    आभार


    आशुतोष

    २४ अप्रैल २०११ ५:०७ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  4. देवेन्द्र ने कहा…

    मैं ठहरा बहता पानी
    कैसे उनके जाल में
    फँस जाऊं ?
    मुझे बहना है
    समुद्र में मिलना है
    बादल बन
    आकाश को छूना है
    निरंतर नया करना है
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ । साधुवाद।

    २४ अप्रैल २०११ १०:४२ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  5. ब्लॉगर हरीश सिंह ने कहा…

    सुन्दर रचना

    २४ अप्रैल २०११ ७:०६ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  6. Anita ने कहा…

    हम उन्मुक्त गगन के वासी पिंजर बद्ध न रह पाएंगे, यह कविता याद आ गयी आपकी कविता पढ़कर !
    २५ अप्रैल २०११ १०:२८ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  7. Aseen Sindhi Sadahin Gaddh(Always together) ने कहा…

    Maan Gaye Dr Tela.
    Heart touching
    २५ अप्रैल २०११ ८:४३ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं