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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

जब वो मेरी बस्ती से गुजरते


जब वो
मेरी बस्ती से गुजरते
सब अपने को प्यासा
समझते
पहले प्यास उसकी बुझे
हसरत से उन्हें देखते
वो निगाह जिस पे डालते
बिना पिए मदहोश
उस को करते
निरंतर अदाओं से
सब को बेहोश करते
चुपचाप सब उन्हें
देखते रहते
वो आराम से गुजर
जाते
होश में आने पर सब
हाथ मलते
फिर से उनके लौटने का
इंतज़ार करते 
05-04-2011
608-41 -04-11
 

1 टिप्पणी:

  1. अरे वाह.... क्या खूब कहा है बहुत ही सुंदर कविता !
    ....और बहुत ही गहरे भाव !

    उत्तर देंहटाएं