ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

कैसे भूल जाऊं ?

रात का वो समाँ
वो चाँद
वो बहकती चांदनी
कैसे भूल जाऊं
ग़मों का आगाज
कैसे भूल जाऊं ?
हसरतों का मिटना,
ख़्वाबों का
टूट कर बिखरना
दर्द-ऐ-दिल का
वो लम्हा
कैसे भूल जाऊं?
उसका ज़िन्दगी से
रुखसत होना
बेरुखी से
दिल से निकालना
कैसे भूल जाऊं ?
जहन में दहकता हुआ
वो अंगारा
कैसे भूल जाऊं
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर 
04-04-2011
597—30 -04-11  
 दर्द-ऐ-दिल,  मोहब्बत, लम्हा, समाँ, हसरत, ख़्वाब, शायरी   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें