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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सपना फिर टूट गया

दरवाज़े
पर दस्तक हुयी
वो सामने खडी थी
आँखें खुली की 

खुली रह गयी
यकीन ना हुआ
ज़न्नत मेरे घर आयी
ख्यालों में खो गया
होश आया,

वो जा चुकी थी
बरस बीत गए ढूंढते ढूंढते थक गया
हताश, निराश हो गया
उम्मीद छोड़ दी
धीरे धीरे भूल गया
आज फिर 

उसकी याद आयी
सोचते सोचते 

आँख लग गयी
सपनों में खो गया
अचानक 

किसी ने उठाया
आँखें खोली तो 

उसे सामने पाया
देख कर 

मुस्करा रही थी
यकीन ना हुआ,
छू कर देखना चाहा तो
पत्नी की आवाज़ आयी
नींद में 

बडबडाना बंद करो
उठने का समय हो गया
उठो ऑफिस जाने की
तैय्यारी करो
सपना फिर टूट गया
जहाँ था,वहाँ रह गया
फिर भी याद नहीं गयी
19-04-2011
705-128-04-11

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