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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

स्वछन्द उड़ना चाहता

खिड़की से झांकता हूँ 
आकाश को निहारता हूँ 
बादलों को देखता हूँ 
निरंतर सोचता हूँ 
मेरे घर 
बादल क्यूं ना आते ?
मुझे साथ क्यूं नहीं उड़ाते ? 
मैं भी उडना चाहता हूँ 
संसार को देखना 
चाहता हूँ 
प्यार का जल बरसाना 
चाहता हूँ 
रूखे सूखे दिलों को 
प्यार से भरना चाहता हूँ 
पहाड़ों की चोटियों को
छूना चाहता हूँ
ऊंचाई का अहसास पाना
चाहता हूँ
क्यों इंसान
ऊंचाई पर सच को 
भूल जाता  ?
जानना चाहता हूँ
हवाओं के साथ बहना 
चाहता हूँ
धरती का टुकड़ा टुकड़ा
देखना चाहता हूँ
सारी संसार को 
अपना बनाना चाहता हूँ
बादल बन जीना 
चाहता हूँ
मैं भी स्वछन्द उड़ना 
चाहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-04--11
571—04-04-11

6 टिप्‍पणियां:

  1. It's a beautiful imagination to conquer the world by being a piece of cloud .

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (2.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    उत्तर देंहटाएं
  3. सारी दुनिया को निरंतर
    अपना बनाना चाहता
    बादल बन जीना चाहता
    स्वछन्द उड़ना चाहता

    बेहतरीन भावपूर्ण रचना के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. bandhanrahit jeevan ki kalpana badal ke sath ud jaane ki .....
    sunder rachna .

    उत्तर देंहटाएं
  5. रूखे सूखे दिलों को
    प्यार से भरना चाहता
    पहाड़ों की चोटियों को
    छूना चाहता
    ऊंचाई का अहसास पाना
    चाहता .....


    बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना ...
    बहुत सुन्दर बिम्ब योजना...
    शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं