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रविवार, 24 अप्रैल 2011

ज़माने को पसंद ना था

ज़माने
को पसंद ना था 
तुम्हारा, हमसे मिलना
उनकी नापाक नज़रों से
बचना था
इसलिए  तुमसे कहा था
कभी ना मिलना
ये तो ना कहा था
ख्यालों में ना रखना
ख़्वाबों में ना आना
मेरे घर के बाहर से
ना निकलना
कभी कहीं ना दिखना
खुद भी रोना,हमें भी
रुलाना
तबाह दिलों को
करना   
24-04-2011
749-169-04-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सीधे शब्दों में आपने दर्द का व्याख्यान किया है

    मेरी नई पोस्ट देखें
    मिलिए हमारी गली के गधे से

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं