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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

दो नन्हे बीज

दो नन्हे बीज
इश्वर के दरबार में
बैठे थे
उन्हें ज़ल्दी से अच्छा
पेड़ बना
दो  
प्रार्थना कर रहे थे
इश्वर ने
पहले बीज से पूंछा
अच्छे से
तुम्हारा क्या मतलब ?
वो बोला
जो देखने में सुन्दर हो ,
सुन्दर फूलों से भरा हो
सब को लुभाए,मन को भाए
हर
व्यक्ति  खुशी से
लगाए
इश्वर ने वही प्रश्न दूसरे से
पूंछा ?
उसने जवाब दिया
चाहे सुन्दरता कम हो,
फूल भी कम आते हों
बहुत अधिक ना लुभाए
मन को चाहे आधा ही भाए
पर राह चलते को छाया दे,
पक्षी घोंसला बना सके
लकड़ी,फल, फूल,पत्ते
निरंतर पशु,पक्षी,इंसान के
काम आ सकें
मुझे ऐसा पेड़ बना दो
इश्वर ने
बात ध्यान से सुनी
एक को गुलमोहर
दूसरे को नीम बना दिया
और कहा जो
दूसरों की सोचता
वो पूरी
दुनिया का चहेता होता
उस का स्थान
कोई नहीं ले सकता
जो अपनी सोचता
खुद में
सीमित रह जाता
26-04-2011
765-185-04-11
E

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छी और संदेश देती रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह! जवाब नहीं आपका. बेशक वही पेड़ फलते और छायादार होते हैं, जिनमें अकड़ नहीं होती.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी कविता में व्यापक संदेश निहित है। इसमें जो भावाभिव्यक्ति हुई है उससे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में व्याप्त विरोधाभास रेखांकित हुए हैं। यह इस रचना की सार्थकता है। पाठक के चिंतन को झकझोरने वाली रचना के लिए साधुवाद!
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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