ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

कैक्टस की व्यथा

क्यों मुझ पर हँसते हो?
मुझ से नफरत करते हो
अपनी इच्छा से कैक्टस
नहीं बना
इश्वर ने मुझे ये रूप दिया
उसकी इच्छा का
सम्मान करो
मुझ से भी तुम प्यार करो
माली की ज़रुरत नहीं
मुझको
स्वयं पलता हूँ
कम जल में भी जीवित
रहकर
बहुमूल्य जल बचाता हूँ
जिसके के लिए तुम
सब को समझाते
वो काम में खुद
करता हूँ
भयावह रेगिस्तान में भी
हरयाली का अहसास
कराता हूँ
खूबसूरत
फूल मुझ में भी खिलते
मेरे तने से
तुम भोजन पाते
कभी किसी से
शिकायत नहीं करता
तिरस्कार सब का सहता
आंधी तूफानों को
निरंतर
हिम्मत से झेलता हूँ
विपरीत परिस्थितियों
में जीता हूँ
फिर भी खुश
रहता हूँ
25-04-2011
763-183-04-11

6 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी इच्छा से कैक्टस
    नहीं बना
    मुझे इश्वर ने ये रूप दिया
    उसकी इच्छा का
    सम्मान करो
    मुझ से भी प्यार करो... tareef se upar

    उत्तर देंहटाएं
  2. एम सिंह has left a new comment on your post "कैक्टस की व्यथा":

    कैक्टस के जरिए जीवन का शानदार संदेश आपने दिया है. आपका प्रयास सफल है. बहुत शानदार और अद्भुत

    उत्तर देंहटाएं
  3. आशुतोष ने कहा…

    कैक्टस का अस्तित्व ही जिजीविषा का द्योतक है ..
    विपरीत परिस्थिति में भी हरा रहने का एहसास

    आशुतोष की कलम से....: मैकाले की प्रासंगिकता और भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव :
    २६ अप्रैल २०११ ८:३१ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  4. हरीश सिंह ने कहा…

    सुन्दर अभिव्यक्ति ...... आभार ।
    २६ अप्रैल २०११ ८:०० अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  5. Anita ने कहा…

    गुलाब पर तो सब लिखते हैं पर आपने कैक्टस को चुना वाह, बहुत सुंदर संदेश !

    २७ अप्रैल २०११ १:१८ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं